Sunday, 8 January 2012

नन्ही सी कली

 
नन्ही सी कली
चली तारो की गली

पूछे सिसक सिसक के
थोड़ा हिचक हिचक के

क्यों भेजती हो वहाँ
तुम नो होगी जहाँ

आने दो न इस संसार मे
कठोर इस जीवन व्यापार में

लालची मुझे तुम न मानना
बस देखना है इस जग को और कुछ है जानना

न देना संदूक, न देना पेटी
बस एक बार कह देना "मेरी बेटी"

मन तुम्हारा भी उदास है
ग्लानि का ग्रास है

मैं तो हुँ तुम्हारी नन्ही सी कली
रोक लो न मुझे जाने से तारो की गली

जा के वहाँ ये तारा टूट जाएगा
माँ-बेटी का ये नाता छूट जाएगा

ऐसे हैरान क्यों हो लेटी
मैं कोई और नही तुम्हारी ही "अजन्मी बेटी"
                                                 

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