Sunday, 20 December 2020

अजनबी

जब भी देखु भीतर अपने
इक अजनबी पाऊँ
कौन हुँ मैं असल में
कभी समझ न पाऊँ
कभी झिझकु भीड़ में
कभी तड़पु एकाकी पीड़ में
कभी बोल जुबाँ पर आ न पाएं
कभी बिन सोचे सब कह जाएं
कभी गुमसुम अवाक सी हुँ मैं
कभी बागी बेबाक सी हुँ मैं
अंदर मेरे ये बैठा है कौन
निष्ठुर अजनबी अब भी है मौन

Saturday, 12 December 2020

मूंगफली

 "सड़क से क्यों?माल से खरीद लेना,ये खा कर बीमार न पड़ जाए"

"जय की आर्ट क्लास मे मूंगफली थीम है,इधर सस्ती मिलेगी।खाने के लिए तो माल से ही लूंगी"

मुश्किल से हुई बिक्री की खुशी,खाने और दिखाने की मूंगफली का फ़र्क सुन गुम हो गयी।अपनी खाली जेब देख दुखी मन से बाबा ने बेच ही दी वो सस्ती आर्ट वाली मूंगफली ।

Saturday, 5 December 2020

दिसम्बर की वो शाम

 दिसम्बर की वो शाम भीड़ से बचने के लिए गाड़ी से ही सड़क पार चाट वाले लड़के को 4 प्लेट के लिये बोल दिया।ट्रे ले वो सड़क के इस पर आने ही वाला था कि तेज आती गाड़ी ने टक्कर मारी और उसके प्राण निकल गए।लोग गाड़ी वाले को कोस रहे थे और मैं अभी भी उसके हाथ मे ट्रे देख अपने आप को।

Saturday, 28 November 2020

सब मिथ्या है

 अब जाने की बारी आयी

तो जीवन पर नजर घुमाई

झोंक दिया सब यौवन

अर्जित करने को धन

सुख खोजते रहे खजाने में

दुःखी होते रहे उसे पाने में

दूर होता गया परिवार

जीवन मे भर लिया विकार

अब सोच रहे सब तो खोया है

व्यर्थ मृत्यु सोच हर कोई रोया है

मृत्यु ही तो सत्य है

बाकी सब मिथ्या है


Thursday, 19 November 2020

उदासी

 उदासी छिपाने को सबसे, हम चेहरे पर इल्जाम लगाते है।

उदास दिल है, और हम चेहरा ही है ऐसा  बोल जाते है।

Friday, 13 November 2020

हाँ क्यूंकि वो नारी है

वो हर मकान को घर बना देती है


पर खुद घर का सुख कहाँ लेती है


कभी बाप का कभी भाई का


और फिर घर पति की कमाई का


दो घरो की उठाती जिम्मेदारी है


हाँ  क्यूंकि  वो नारी है




मारना पीटना उसे दिखा देना  दहलीज़


पलट जवाब दे दे तो घोषित कर देना बद्तमीज़


लाख गलतियां तुम करना


हक़ है तुम्हे ये दम भरना


पर उसकी हर गलती बहुत भारी है


हाँ  क्यूंकि  वो नारी है




उसकी सुबह से सांझ का कोई अनुमान न लगाना 


"घर पर करती ही क्या हो" का मार देना ताना


छोटी छोटी बचते उसकी किस काम की


उसकी तो बिंदी भी लगती तुम्हे ज्यादा दाम की


उसके हर काम में दिखती बेकारी है


हाँ  क्यूंकि  वो नारी है




न करेगी विरोध सब सह जाएगी


घर बचाने को अपना, चुप रह जाएगी


एक घर ने पराया कह विदा किया 


दूसरे ने कभी अपना बनने नहीं दिया


हर तरफ से हुई बेचारी है


हाँ क्यूंकि वो नारी है 






बहुत हुआ, अब सहना और नहीं 


मत सिखाओ क्या गलत क्या सही 


बेटी, बीवी ,बहु, माँ सब फर्ज निभाए है


फिर भी उसके हिस्से दुखो के कर्ज आये है


वो अबला नहीं सब शक्तियों की प्रभारी है


हाँ क्यूंकि वो नारी है 




उस जननी का क्यों करते हो अपमान


अरे कम से कम उसे समझो इंसान


इज्जत प्रेम की वो भी है हकदार


उसकी इच्छाओ को मत करो दरकिनार


मुसीबत जैसी भी हो,साथ देती हर बारी है


हाँ क्यूंकि वो नारी है 




 


जीवन की गाड़ी का वो भी एक हिस्सा है


उसकी बातो से भरा दुनिया का हर किस्सा है


ये दुनिया बहुत संवर जाएगी


जब वह फिर से सम्मान पायेगी


उसमे दुनिया बदलने की शक्ति सारी है


हाँ क्यूंकि वो नारी है


Sunday, 8 November 2020

फुलझड़ी

 "फुलझड़ी देना"

"एक डब्बी फुलझड़ी बोलो"

"समझ गयी न!तो फुलझड़ी दो"

"एक डब्बी फुलझड़ी बोलो"

"क्यों"

"किससे लड़ रही है फुलझड़ी,क्या लोगे बेटा"

"जी फुलझड़ी,नहीं एक डब्बी फुलझड़ी"

गुस्से से लाल फुलझड़ी को देख गांव में नया आया राज सोचने लगा सही नाम है: चिंगारी फेंकती "फुलझड़ी"

दीवाली

 "इतनी मिठाई?हम दोनों बूढों के सिवा कोई घर मे है नहीं और तुम्हे शुगर है तो इतनी मिठाई क्यों?"

"राधे को दूंगा,कुर्ता भी बनवाया है उसके लिए।दीवाली पर उस गरीब के घर मे भी खुशियो की रोशनी हो जाएगी"

"सच मे चौकीदार होकर भी lockdown में उसने ऐसा ख्याल रखा जैसे हमारा ही बच्चा हो"

Sunday, 1 November 2020




क्या अद्भुत कलाकारी है

बच्चे को गोद मे बिठाए माँ प्यारी है

वो पल भी कितना कमाल होगा

जब हाथ मे हथौड़ी और मन मे माँ का ख्याल होगा

भाव ऐसा की लोहे में भी लचक ला दी

कठोर लोहे में भी माँ की झलक दिखा दी

प्रेम

 देवकी का जाया 

यशोदा ने पाला

एक ने की रचना

दूसरी ने ढाला


बरसाने की राधा

गोकुल का ग्वाला

झेल गयी विरह

न कान्हा को टाला


मीरा सी भक्तिन

कान्हा सा रखवाला

न झिझकी एक बार भी

पी गयी जहर प्याला 


प्रेम का ऐसा रूप

निश्छल और निराला

ढाई अक्षर के प्रेम को

सहज ही परभाषित कर डाला


रिटायरमेंट

 "तैयार हो गए पापा।ये जैकेट माँ लायी थी न आपकी रिटायरमेंट के लिए।अरे काला चशमा तो रह गया।माँ ने कहा था जैकेट के साथ पहनना "जितेंद्र" लगोगे।अभी माँ गुस्सा हो जाती।"

"गुस्सा तो मैं हुँ।बहुत प्यार से लाई थी न सब पर मेरी रिटायरमेंट देखने से पहले खुद दुनिया से रिटायर हो गयी"।


Friday, 30 October 2020

पेंटिंग

"मातृ दिवस पर पेंटिंग मुकाबला था
अनु ने ये बनाया"
पेंटिंग देख अनु की माँ रो पड़ी।औरत को पीटता आदमी बनाया था,औरत के साथ लिखा था माँ।
"रोकर क्या होगा।ऐसा न हो बेटी दिवस पर पेंटिंग मे माँ की जगह अनु हो"
"नहीं होगा"आंसू पोछती माँ बोली
मुकाबला न सही पर डर को जीत गयी पेंटिंग।

Saturday, 24 October 2020

विजय

 "हम" और "मैं" की लड़ाई है

एक दूजे पर की चढ़ाई है

जब "हम" ही "मैं" बन जाए

तो कैसे विजय हो पाए

आंक रहे धर्म पर

नज़र नही कर्म पर

जब धर्म कर्म पर भारी हो जाए

तो कैसे विजय हो पाए

पैसो की ही सब बात है

इन्सानियत को दी मात है

जब इंसानियत को पैसे से तोला जाए

तो कैसे विजय हो पाए 

कुर्ता

 नया कुर्ता पहन बाबा,राजू की शादी पर उत्सुक थे।गांव के सबसे बुजुर्ग थे,बुलावा बनता था।शादी हो गयी पर बुलावा न आया। कुर्ता पेटी में रखते हुए बाबा को कुर्ते पर दाग दिखा। "लाज रख ली भगवान ने,अच्छा हुआ बुलावा नही आया,बेज्जती होती"।कुर्ते के दाग से अपने मन को मना रहे थे बाबा।

Saturday, 17 October 2020

धूप

 मीलों की दूरी थी

फिर भी नज़दीकी पूरी थी

एक सांझी धूप का सहारा था

एक उसका और एक मेरा किनारा था

वो धूप उसे छू कर देने आती थी मुझे गर्माहट 

रह रह कर वो गर्मी देती थी उसकी आहट

न गर्मी न सर्दी, धूप ने न कोई भेद भाव किया

कभी भी मेरे मन को न विरह का कोई घाव  दिया 


तुम धूप के जैसे बन जाना

 तुम धूप के जैसे बन जाना

हर मौसम में  मिल जाना

खुश हो बन जाना सर्दी की धूप

गुस्से में ले लेना गर्मी का रूप

बादल, बरखा  सब आएंगे

अपने अंदर तुम्हें छिपाएंगे

तुम इंद्रधनुष बना कर फिर निकल आना

सब छोड़ पीछे एक बार फिर खिल जाना

तुम धूप के जैसे बन जाना

हर मौसम में मिल जाना

 

Thursday, 15 October 2020

चिराग

 चिराग तले अंधेरा बोल क्यों मज़ाक उड़ाते हो मेरा

खुद अंधेरे में हुँ पर देख घर रौशन कर रहा हुँ तेरा

Wednesday, 14 October 2020

चुप सा शोर

कुछ बोलने ही नही देता मन मे बैठा एक चुप सा शोर
लोग यूँ ही घमंडी मान मुझे खबरें फैला रहे हैं हर ओर


Sunday, 11 October 2020

अंधेरा

 रौशनी की चाह में चिराग़ जलाया तो अंधेरा बिफर गया

बोला एक रात ही तो आती है अमावस्या तू उससे भी डर गया


पर्दा

 घर की हर कमी छुपा रहा था

एक पर्दा मेरा घर सजा रहा था

फर्जी साख और  मान था

पर्दा मेरी झूठी शान था

जितनी भी चीख औऱ पुकार थी

सब पर्दे के पीछे बेकार थी

छिपाने का एक जरिया था

पर्दा झूठ से भरा दरिया था

एक दिन पर्दे में सुराख़ हो गया

बेदाग़ सा घर मेरा दागदार हो गया


Sunday, 4 October 2020

जलेबी

 

आंगन में राधा जी मसाले सूखा रही थी और उनकी बड़ी बहु का बेटा टिंकू वही खेल रहा था।तभी गुप्ता आंटी आई।"तुम्हारी छोटी बहू तो बहुत सीधी लगती है",गुप्ता आंटी ने राधा जी को बोला

राधा जी व्यंग कसते हुए बोली " हाँ जी, बिल्कुल सीधी है जलेबी की तरह "।


खिचड़ी का त्योहार आया और नई बहु के मायके वाले आये । उन्हें जलेबी परोसी गयी।

राधा जी ने टिंकू को चाची को बुलाने को कहा।

टिंकू ने मेहमानों के सामने ही पूछ डाला कौन सी चाची को ,मझली चाची या जलेबी सी सीधी चाची को।मायके वाले अब परोसी हुई जलेबी को अनदेखा कर रहे थे और राधा जी उन्हें।जलेबी की मिठास का तो पता नही पर बाते अब जलेबियों की तरह उलझ गई थी।राधा जी ने सब संभालने के लिए अब गोल- गोल जलेबी सी बातें बनानी शुरू कर दी थी।

अब बच्चा क्या जाने "जलेबी सी सीधी" क्या होवे है?😀


चंद्रमा



ठंडी ,शीतल ,साफ वो पूर्णिमा की थी रात

जब हमने शुरू कर दी थी चंद्रमा से बात


बड़े आराम से सुनता था वो मेरी बातें  रह कर इतना  दूर

न कभी थकता, न कभी चिढ़ता ,  न कभी दिखाता गुरूर


हर रोज वो कुछ दूर होता जा रहा था,

 आसमान में न जाने कहाँ खोता जा रहा था


उसे जाता देख , खो रही थी आस,

 मन बैचैनी से भर,हो गया था उदास


एक दिन ऐसा आया वो दिखा न किसी भी

ओर

आसमान में भी  छाया था अंधेरा घन घोर


ओ चंचल चंद्रमा तुमसे मिलने का ऐसा चढ़ा था सरूर

जब अमावस पे ना आये तो हमने मान लिया अपना ही कसूर


फिर जब तुम धीरे धीरे पास आने लगे,

 उदास मन को  फिर से हर्षाने लगे।


आंखों में मेरे चमक आने लगी थी

मेरी बातें तुम्हे फिर से भाने लगी थी


तुम ने बदला अपना व्यवहार, पहले पास आना फिर कराना इंतज़ार

मानो सिखा रहे हो जैसे दुख-सुख ,मिलन-विरह का सार




Saturday, 3 October 2020

बिटिया

 अनु अपनी गुड़िया को "बिटिया" कहती थी।अम्मा ने देखा आज वो गुड़िया को बहुत दुलार रही थी

" बिटिया काहे इतना प्यार आ रहा है इस पर"

"मुझे और इसे बिटिया न बुलाना आज से"

"काहे"

"टीवी पर आ रहा था दरिंदो ने ले फिर एक बिटिया की जान"

अम्मा निशब्द थी काश नाम बदलने से नसीब बदल जाते ।

Friday, 2 October 2020

झूठ

 बेहाली में भी अपना हाल खुशहाल बता गयी

फिर से झूठ का वो एक जाल बिछा गयी


भूख थी, पर रोटियों की गिनती उसका पेट भर गई

गले तक भरा है खाना,ये झूठ बोल वो तर गई


माथे पे लगे घाव को वो छोटी  सी चोट बोल गयी

झूठ का ले सहारा वो इसे सीढ़ियों का खोट बोल गई


नारी है देवी का रूप, पर ये देवी क्यों दुःखी है

बार बार बोल झूठ ,ये क्यों होना चाहती सुखी है

बेटी

 कैसे जाए इस संसार में

कई बातें लाये अपने विचार में

अब रावण बैठा हर घर मे

जीना पड़ेगा अब तो डर में

सब पापी और भक्षक है

कृष्णा,राम जैसे न रक्षक है

नारी के मान का अब कोई मोल नही

मूक दर्शको के मुँह में कोई बोल नही

हर दिन नारी चिता पर है लेटी

सोच ये सब घबराए अजन्मी "बेटी"

Tuesday, 29 September 2020

हाथरस


इज्जत को करके तार तार
कहाँ शांत हुए वो खुंखार
हैवानियत की हर हद को कर पार
उसके प्राण हरने के लिए किया प्रहार
जिस जुबाँ से देती थी वो माँ को पुकार
काट दिया उस जुबाँ को कर दिया बेकार
कई सपने थे उसके जिनको करना था साकार
पर उसकी तो सांसे भी लूट ले गया ये संसार

Sunday, 13 September 2020

मुन्ना

राजू जो कि कक्षा ५(5) का छात्र था, उसे कक्षा १०(10) का छात्र  मनोज किसी बात को लेकर चिड़ा रहा था।उसने गुस्से में मनोज का सिर फोड़ दिया।

मामला प्रिंसिपल साहेब के पास गया।

"क्यों मारा तुमने मनोज को?", प्रिंसिपल ने राजू को पूछा।

"वह मुझे चिड़ा रहा था ",राजू ने जवाब दिया। 

"ऐसा क्या कह रहा था वह तुम्हे ,कि  तुमने उसका सिर फोड़ दिया ?"

राजू ने सिर निचे कर लिया और कोई जवाब न दिया। चपरासी को कह कर उसके पिता जी को बुलाया गया।राजू के पिता जी तुरंत स्कूल आ गए।उनकी  आयु कुछ ४५(45) बरस के करीब होगी।उन्होंने प्रिंसिपल साहेब को हाथ जोड़ कर नमस्ते बुलाया। राजू की शिकायत उसके पिता जी से की गई और झगड़े का कारण जानने की कोशिश की गई। राजू कुछ न बोला और चुप रहा।प्रिंसिपल ने राजू के पिता से उनका नाम पूछा ताकि वह उन्हें उनके नाम से संबोधित कर सके।  "मुन्ना" , राजू के पिता ने जवाब  दिया।उनका नाम सुन कर चपरासी हँस पड़ा। राजू ने प्रिंसिपल के मेज़ से पेपर्वेट उठाया और चपरासी के सिर पर दे मारा। अब सब जान चुके थे झगड़े की वजह।

Saturday, 12 September 2020

corruption

 Rusting of iron is corrosion, Rusting of plastic is corruption.

Friday, 4 September 2020

शिक्षक दिवस

 अक्षर जोड़ जोड़ कर शब्द बनाना सिखा दिया

बेढंगा ये जीवन रह जाता, जिसे आपने संवार दिया

Wednesday, 26 August 2020

आक़िबत

 बड़ा हसीन हो जाए आक़िबत मेरा

जो मेरे बख़्त से जुड़ जाए नाम तेरा

Tuesday, 25 August 2020

वाबस्ता

 दिल जान कर भी बनता अनजान है

अँधेरी गलियों से पूछता उनकी  पहचान है 

कुछ इस कदर वाबस्ता था उनसे कि

उन्होंने ठुकराया इस बात का भी हमे गुमान है

Monday, 17 August 2020

ग़ैर

 अब हमने अपनो और गैरों में फर्क करना छोड़ दिया है

करें भी कैसे जब गैरों की तरह अपनो ने भी मुँह मोड़ लिया है

Saturday, 15 August 2020

परछाई

बनकर परछाई वो साथ चलने का वादा कर हमें छल गए,
जैसे अंधेरे में साथ छोड़ देती है परछाई वो भी हमें छोड़ कर चल गए

मन की किताब

बड़ी ही अनोखी है  ये मन की किताब,

पन्ने कम है और लिखने को हज़ारो हैं ख्वाब।

Sunday, 2 August 2020

इस बार की राखी का कुछ अलग ही है रंग

न पास भाई की कलाई है
न हमने राखी भिजवाई है
फिर भी उत्साह में न कोई कमी है
हाँ आंखों में बस थोड़ी नमी है
इस बार हर त्योहार का बदला है कुछ ढंग 
इस बार की राखी का कुछ अलग ही है रंग 
            
          भाई की लम्बी उम्र की कामना है
          इस लिए तो अरमानो को थामना है
          भाई दूर रहे या रहे पास 
         सही सलामत रहे यही है आस
        बीत जाए ये महामारी  फिर से होंगे संग
       इस बार की राखी का कुछ अलग ही है रंग

राखी रेशम से हो या फिर हो मौली से बनी
बांध कर इसे भाई खुद को समझता है धनी
रह कर दूर एक दूसरे को देना हिदायत 
"नियमों का करो पालन , न करो शिकायत"
भाई बहन के प्यार का ये भी तो  है एक ढंग 
इस बार की राखी का कुछ अलग ही है रंग 

                    
         स्नेह के धागों से बंधी ये दिल की है डोर
         एक सिरा बहन तो भाई है इसका दूसरा छोर
         दूरी, महामारी या चाहे कोई हो परेशानी
         भाई बहन के प्रेम ने भी जिद्द ये है ठानी
       हरा के इस महामारी को फिर होंगे संग
       इस बार की राखी का कुछ अलग ही है रंग
          

Sunday, 26 July 2020

शहीद की माँ


सब रो रहे थे सीना पीट पीट कर , 
ले रहे थे उसके दुख की थाह
वो बैठी थी जैसे कोई शीतल लहर
या जैसे बिन हल चल के शांत राह
क्यों विलाप करे वो , क्यों बहाये नीर
क्यों कोसे भगवान,क्यो कोसे पीर
दिल भरा हुआ था, पर  माथे पर उसके, जैसे बहुत  सुकून था
वो गर्वित थी, जो शहीद हुआ उसका बेटा, उसका अपना खून था

Thursday, 9 July 2020

जुबाँ

मन कहना बहुत कुछ चाहता था पर जुबाँ कुछ ख़फ़ा सी थी
सोचा आँखे कुछ बयां कर देगी पर कमबख्तों ने जुबाँ से निभानी वफ़ा जो थी

Sunday, 5 July 2020

शब्द

ख्यालो को शब्दों में ढाला तो वो जग जाहिर हो गए,
चुप रहकर भी हम अपना हाल बताने में माहिर हो गए।

Saturday, 4 July 2020

इल्म

पढ़ पढ़ फ़ाज़िल होया नकली इल्म हज़ार।
असली इल्म न पड़े इज़्ज़त, वफ़ा और प्यार।

~ पुनीता मिश्रा