बेहाली में भी अपना हाल खुशहाल बता गयी
फिर से झूठ का वो एक जाल बिछा गयी
भूख थी, पर रोटियों की गिनती उसका पेट भर गई
गले तक भरा है खाना,ये झूठ बोल वो तर गई
माथे पे लगे घाव को वो छोटी सी चोट बोल गयी
झूठ का ले सहारा वो इसे सीढ़ियों का खोट बोल गई
नारी है देवी का रूप, पर ये देवी क्यों दुःखी है
बार बार बोल झूठ ,ये क्यों होना चाहती सुखी है
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