मेरे जवाब सुन मुझें गुस्ताख़ कहने वाले
तेरे सवाल भी कुछ कम गुस्ताख़ न थे।
जो न कही गयी
बात वो कहनी है
तू राज़दार मेरा
बीच हमारे रहनी है
रात अमावस्या की
दिल घबराता है
ग़म मेरे मन का
मन मे रह जाता है
इंतजार हर रात
हो तेरा दीदार
ऐ चांद बिन तेरे
मन मेरा बेज़ार
गुज़ारिश करू रात से
ठहर जा लम्हा कुछ और
तुझ से ही तो चलता है
चांद से गुफ्तगू का दौर
30 साल पहले शीशम की लकड़ी से बना दरवाज़ा आज भी कायम था।तीनो बेटे घर का बँटवारा कर दरवाज़ा अपने हिस्से लेने के लिए लड़ रहे थे।मज़बूत दरवाज़ा आज कमजोर बूढ़ी माँ से ज़्यादा अहम था जिसे अपने हिस्से लेने कोई तैयार न था।शायद यह भी तय न था- वो दरवाजे के इस पार रहेगी या उस पार।
मां पॉपकॉर्न खा रही थीं कि गांव से ताऊजी आए।हमसे पहली बार मिल रहे थे,माँ से पूछा इसे क्या बुलाती हो।गांव में तो भुजा बोलते हैं सोच माँ झट बोली पॉपकॉर्न।बिना समझे कि ताऊजी भुजा नही हमारा पूछ रहे है।ताऊजी ने भी सोचा होता होगा शहरो में ऐसा नाम और दे गए हमे निकनेम पॉपकॉर्न।
60 हजार थे बाबा के खाते में।किसी ने निकाल लिए।पुलिस का सोच ही रहे थे कि फोन आया पुलिस के पास मत जाना।
"मुझ बूढ़े की जमा पूंजी ले गया तू"
फोन कटा,मैसेज आया खाते में 20 हजार आ गए।
ये कैसा छलिया था,छल किया पर सही से छला भी नहीं।कुछ सोच बाबा ने पुलिस के पास जाना रहने दिया।
जब भी देखु भीतर अपने
इक अजनबी पाऊँ
कौन हुँ मैं असल में
कभी समझ न पाऊँ
कभी झिझकु भीड़ में
कभी तड़पु एकाकी पीड़ में
कभी बोल जुबाँ पर आ न पाएं
कभी बिन सोचे सब कह जाएं
कभी गुमसुम अवाक सी हुँ मैं
कभी बागी बेबाक सी हुँ मैं
अंदर मेरे ये बैठा है कौन
निष्ठुर अजनबी अब भी है मौन
"सड़क से क्यों?माल से खरीद लेना,ये खा कर बीमार न पड़ जाए"
"जय की आर्ट क्लास मे मूंगफली थीम है,इधर सस्ती मिलेगी।खाने के लिए तो माल से ही लूंगी"
मुश्किल से हुई बिक्री की खुशी,खाने और दिखाने की मूंगफली का फ़र्क सुन गुम हो गयी।अपनी खाली जेब देख दुखी मन से बाबा ने बेच ही दी वो सस्ती आर्ट वाली मूंगफली ।