Sunday, 30 April 2023

गुस्ताख़

मेरे जवाब सुन मुझें गुस्ताख़ कहने वाले 

तेरे सवाल भी कुछ कम गुस्ताख़ न थे।

Sunday, 31 January 2021

चांद से गुफ्तगू

 जो न कही गयी

बात वो कहनी है

तू राज़दार मेरा

बीच हमारे रहनी है

रात अमावस्या की

दिल घबराता है

ग़म मेरे मन का 

मन मे रह जाता है

इंतजार हर रात

हो तेरा दीदार 

ऐ चांद बिन तेरे

मन मेरा बेज़ार 

गुज़ारिश करू रात से

ठहर जा लम्हा कुछ और

तुझ से ही तो चलता है

चांद से गुफ्तगू का दौर

Saturday, 16 January 2021

दरवाज़ा

 30 साल पहले शीशम की लकड़ी से बना दरवाज़ा आज भी कायम था।तीनो बेटे घर का बँटवारा कर दरवाज़ा अपने हिस्से लेने के लिए लड़ रहे थे।मज़बूत दरवाज़ा आज कमजोर बूढ़ी माँ से ज़्यादा अहम था जिसे अपने हिस्से लेने कोई तैयार न था।शायद यह भी तय न था- वो दरवाजे के इस पार रहेगी या उस पार।

Sunday, 10 January 2021

पॉपकॉर्न

 मां पॉपकॉर्न खा रही थीं कि गांव से ताऊजी आए।हमसे पहली बार मिल रहे थे,माँ से पूछा इसे क्या बुलाती हो।गांव में तो भुजा बोलते हैं सोच माँ झट बोली पॉपकॉर्न।बिना समझे कि ताऊजी भुजा नही हमारा पूछ रहे है।ताऊजी ने भी सोचा होता होगा शहरो में ऐसा नाम और दे गए हमे निकनेम पॉपकॉर्न।

Sunday, 3 January 2021

छलिया

 60 हजार थे बाबा के खाते में।किसी ने निकाल लिए।पुलिस का सोच ही रहे थे कि फोन आया पुलिस के पास मत जाना।

"मुझ बूढ़े की जमा पूंजी ले गया तू"

फोन कटा,मैसेज आया खाते में 20 हजार आ गए।

ये कैसा छलिया था,छल किया पर सही से छला भी नहीं।कुछ सोच बाबा ने पुलिस के पास जाना रहने दिया।

Sunday, 20 December 2020

अजनबी

जब भी देखु भीतर अपने
इक अजनबी पाऊँ
कौन हुँ मैं असल में
कभी समझ न पाऊँ
कभी झिझकु भीड़ में
कभी तड़पु एकाकी पीड़ में
कभी बोल जुबाँ पर आ न पाएं
कभी बिन सोचे सब कह जाएं
कभी गुमसुम अवाक सी हुँ मैं
कभी बागी बेबाक सी हुँ मैं
अंदर मेरे ये बैठा है कौन
निष्ठुर अजनबी अब भी है मौन

Saturday, 12 December 2020

मूंगफली

 "सड़क से क्यों?माल से खरीद लेना,ये खा कर बीमार न पड़ जाए"

"जय की आर्ट क्लास मे मूंगफली थीम है,इधर सस्ती मिलेगी।खाने के लिए तो माल से ही लूंगी"

मुश्किल से हुई बिक्री की खुशी,खाने और दिखाने की मूंगफली का फ़र्क सुन गुम हो गयी।अपनी खाली जेब देख दुखी मन से बाबा ने बेच ही दी वो सस्ती आर्ट वाली मूंगफली ।