जब भी देखु भीतर अपने
इक अजनबी पाऊँ
कौन हुँ मैं असल में
कभी समझ न पाऊँ
कभी झिझकु भीड़ में
कभी तड़पु एकाकी पीड़ में
कभी बोल जुबाँ पर आ न पाएं
कभी बिन सोचे सब कह जाएं
कभी गुमसुम अवाक सी हुँ मैं
कभी बागी बेबाक सी हुँ मैं
अंदर मेरे ये बैठा है कौन
निष्ठुर अजनबी अब भी है मौन
Sunday, 20 December 2020
अजनबी
Saturday, 12 December 2020
मूंगफली
"सड़क से क्यों?माल से खरीद लेना,ये खा कर बीमार न पड़ जाए"
"जय की आर्ट क्लास मे मूंगफली थीम है,इधर सस्ती मिलेगी।खाने के लिए तो माल से ही लूंगी"
मुश्किल से हुई बिक्री की खुशी,खाने और दिखाने की मूंगफली का फ़र्क सुन गुम हो गयी।अपनी खाली जेब देख दुखी मन से बाबा ने बेच ही दी वो सस्ती आर्ट वाली मूंगफली ।
Saturday, 5 December 2020
दिसम्बर की वो शाम
दिसम्बर की वो शाम भीड़ से बचने के लिए गाड़ी से ही सड़क पार चाट वाले लड़के को 4 प्लेट के लिये बोल दिया।ट्रे ले वो सड़क के इस पर आने ही वाला था कि तेज आती गाड़ी ने टक्कर मारी और उसके प्राण निकल गए।लोग गाड़ी वाले को कोस रहे थे और मैं अभी भी उसके हाथ मे ट्रे देख अपने आप को।
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