Sunday, 29 January 2017

दो पंक्तिया मन से

** या तो चुप रह के सह लो,
     या फिर अपने मन की कह लो।

** संभालना बड़ा मुश्किल,
     एक जिद्दी दिमाग और दूसरा फ़ितना दिल

** तन्हाई में ही मिलता है दिल को सुकून और चैन
     पता नहीं भीड़ में क्यों घबरा जाते हैं मेरे ये नैन

** रात सुन मेरी ख्वाइश ,ठहर जा लम्हा कुछ और
 तेरे सहारे ही तो चलता है तारो से बातो का दौर

** काश जमानत मिल जाये मेरे अरमानो को किसी के आने से
     खुद ही कैद कर के रखा है जिन्हें अभी तक मैंने  जमाने से

** अगर आँखों ने अपना फर्ज निभाया होता 
    अपनी चुप्पी पे मेरा दिल पछताया न होता

** ना ना कहते हुए भी हमसे हाँ हो गयी,
     दिल की बात थी जो आँखों से बयाँ हो गयी।

** शब्द तो मेरे हैं पर सोच है तेरी,अगर तुझे समझ आये तभी जीत होगी मेरी।

** न तीर से न तलवार से
चोट लगती है ज्यादा शब्दों के वार से

** हम भी कभी आबाद थे,बेफिक्र थे,आजाद थे ।

** मुझसे ही बात पूछकर बिलकुल अंजान बन गए,
पहले तो तुम सिर्फ झूठे थे,अब तो बेईमान बन गए।

** ख्यालो को शब्दों में ढाला तो वो जग जाहिर हो गए
चुप रहकर भी हम अपना हाल बताने में माहिर हो गए

Sunday, 8 January 2017

जन्मदिन का तोहफा





समय कुछ सवेरे के 4 बजे होंगें।हाँ माना आज के मॉडर्न नए ज़माने के लोग सवेरे के 4 बजे को आधी रात मानते हैं।तभी तो हैरानी होती है कि सलीम जो कभी स्कूल जाने वाले दिन भी 7 बजे से पहले नहीं उठता था।आज रविवार को 4 बजे क्यों उठ गया ?

सलीम 15 साल का बालक था जो अपने पिता जी के साथ कश्मीर में रहता था।उसकी माता का देहान्त हो चुका था ।कम से कम एक 25-26 वर्ष की महिला की तस्वीर जिसकी आँखे सलीम जैसी ही थी,को देखकर ऐसा ही प्रतीत होता था।सलीम के पिता जी कालीन बेचने का काम करते थे।वो बहुत ही भले इंसान थे।कश्मीर के हालात से वो बहुत दुःखी थे।वो सलीम को हमेशा नेकी के राह पर चलने की  सलाह देते थे।सलीम अपने अब्बा से बहुत प्यार करता था।अरे !आज तो सलीम के अब्बा का जन्मदिन था।और सलीम उनके लिए कुछ करना चाहता था।पर उसके पास पैसे नहीं थे।
उसे अपने अब्बा के लिए जूते लेने थे।उसके अब्बा के जूते फट चुके थे।पर इस के लिए सवेरे 4 बजे उठने की क्या जरुरत थी , और वो जूते कैसे खरीदेगा?

सलीम ने अपना रुख घर के बाहर चौराहे की ओर किया।चौराहे की ओर जाते हुए एक जगह जहाँ कुछ ईमारत बनाने का काम चल रहा था,वहाँ से सलीम ने कुछ अपने साथ लाये हुए थैले में भरना शुरू किया,अँधेरे में पता नहीं चला की वो क्या था।फिर उसने यह थैला चौराहे के पास ही चाय वाले की दुकान के बाहर पड़े मेज के नीचे रख दिया।सलीम अब्बा के उठने से पहले ही घर आ गया।

अब्बा उठे,नहा के उन्होंने सलीम के कमरे की ओर रुख किया।और उसे सोता देखकर मस्जिद में सुबह की नमाज़ के लिए निकल पड़े।अब्बा के जाने के बाद सलीम के घर पर दस्तक हुई।बगल के घर से हामिद जिसकी उम्र कुछ 19-20 वर्ष होगी, आया था।उसके हाथ में नए जूते थे।क्या यह वही जूते थे जो सलीम अपने अब्बा को देना वाला था।जूतों को देखकर सलीम की आँखों की चमक से तो ऐसा ही लग रहा था।

अब तक सवेरे के 7 बज  चुके थे।सलीम हामिद के साथ बाहर निकल पड़ा।हालांकि उसके अब्बा ने उसे हामिद से दूरी बना के रखने को कहा था।हामिद चौराहे के पास वाली ईमारत की छत पर चढ़ गया।जैसे की वो सलीम पर वहाँ से नज़र रख रहा हो।चौराहे के सामने ही पुलिस चौकी थी। और आज चौकी में नए थानेदार आने वाले था।उस थानेदार की काफी चर्चा थी उसका काफी दबदबा है,उसके इलाके में जुर्म का नामोनिशान नहीं  रहता।वो सवेरे 9 बजे तक पहुँचने वाला था।चौराहे पर काफी चहल-पहल हो चुकी थी।सलीम उसी मेज पर जाकर बैठ गया जहाँ उसने वो थैला रखा था।हामिद ऊपर से उस पर नजर रख रहा था।ऐसा लग रहा था जैसे वह कुछ और लड़कों पर भी नज़र रखे हुए था।आज रविवार वाले दिन भी काफी लड़के चौराहे के पास देखे जा सकते थे।कुछ पास में ही क्रिकेट खेल रहे थे।कुछ गप्पे मार रहे थे।

ठीक 8:50 पर नए अफसर की गाड़ी चौराहे की तरफ आती दिखाई दी।सलीम और काफी और लड़को ने अपने चेहरे पर कपड़ा बाँध लिया।सलीम ने वो थैला बाहर चौराहे पर फैंक दिया।उसमे तो ढेर सारे पत्थर थे।ऐसा ही कुछ और लड़कों ने किया।सबने पत्थर उस नए अफसर के काफिले पर फैंकने शुरू कर दिये।इस पत्थरबाज़ी में पुलिस वालो ने जल्दी से अपनी गाड़ी निकलने की कोशिश की।सलीम ने एक बहुत बड़ा पत्थर उठाया और इतनी जोर से उत्साह से फैंका जैसे की कोई शॉटपुट का खिलाड़ी अपने फाइनल्स में फैंकता है।जैसे इसके बदले में उसे कोई इनाम मिलने वाला हो।पर जैसे ही उसने पत्थर गाड़ी की ओर फैंका गाड़ी तो आगे निकल गई, पर यह पत्थर सामने से आते उसके अब्बा को लगा।

सलीम भौचक्का ही रह गया।सलीम ने सोचा था उसके अब्बा मस्जिद से आकर घर में होंगे।पर उसे क्या पता था उसके अब्बा मस्जिद से आकर चौराहे के पास ही रहने वाले अपने चाचा जान से उनकी ख़ैरियत पूछने और अपने जन्मदिन पर दुआ लेने आए हैं।सलीम ने अपने चेहरे से कपड़ा हटा दिया । उसे ऐसा करते देख और उसके अब्बा को जमीन पर गिरा देख सब लड़के भाग गए।हामिद भी भाग गया।चौकी के पुलिस वालो ने सलीम के अब्बा को अस्पताल पहुंचाया।

खून काफी बह चुका था।चोट सीधे सिर पर लगी थी।सलीम के अब्बा ने पुलिस की गाड़ी में ही अस्पताल जाते वक़्त इशारे से पूछा की उसने ऐसा क्यों किया?सलीम पुलिस वालों के सामने कुछ न बोला ।न ही पुलिस वालो ने उसे मजबूर किया।वो भी एक बेटे का दर्द समझ गए।अस्पताल में सलीम के अब्बा का इलाज कर रहे डॉक्टर कुछ समय बाद इमरजेंसी वार्ड से बाहर आये और बताया कि अब्बा की हालत नाज़ुक है।फिर भी वो सलीम से मिलना चाहते है।सलीम ने अंदर जा कर बिना कुछ पूछे ही कहना शुरू कर दिया की उससे अब्बा को ठण्ड में फटे जूते पहने नहीं देखा जाता था।और उसे यह भी पता था कि अब्बा कभी नए जूते नहीं लेंगे।उसने हामिद के चाचा की दूकान से जूतो के बारे में पूछा था।वो बहुत महंगे थे ।वो कुछ भी कर के ,अपनी गोलक तोड़ कर या छोटा मोटा काम करके इतने पैसे नहीं ला सकता था।तब हामिद ने उसे सिर्फ पत्थर फैंकने पर नए जूते देने का वादा किया था। और वो नए जूते ले कर भी आया था।पत्थर फैंकने के बाद वो उसे जूते देेेने वाला था।

इतना सुनते ही अब्बा ने इशारो में सलीम को कुछ बताने की कोशिश की पर उनका साँस लेना मुश्किल होता जा रहा था।सलीम ने जल्दी से डॉक्टर को बुलाया ।सलीम को बाहर भेज दिया गया।बाहर सलीम के अब्बा के चौराहे वाले चाचा भी पहुँच गए थे।उन्होंने सलीम को दुत्कारा और कहने लगे तुमने वही काम किया जिसने तुम्हारी माँ की जान ली और आज तुम्हारे अब्बा भी मौत के मुँह में पहुँच गए हैं।सलीम ने रोना शुरू कर दिया।सलीम के अब्बा ने उसे कभी नहीं बताया था कि उसकी माँ भी ऐसे ही पत्थर फैंकने वालो का शिकार बन कर इस दुनिया को अलविदा कह गयी थी ।और उन पत्थर फैंकने वालो में उसके अब्बा का छोटा भाई यानी उसके  चाचा भी शामिल थे।सलीम की अम्मी अपने देवर यानी की सलीम के चाचा को रोकने के लिए गयी थी।सलीम के अब्बा को अपनी जान से ज्यादा इस बात का अफ़सोस था कि पहले वो अपने भाई और अब अपने बेटे को उन लोगों से नहीं बचा पाये जो पैसे का लालच दे कर मासूम बच्चो और नौजवानों को अपना शिकार बनाते है। अब सलीम को अपनी गलती का एहसास हो चुका था।उसके अब्बा को अस्पताल पहुँचाने पुलिस वाले ही सामने आये थे।उसके साथ के लड़के भाग गए और हामिद भी।वो अपने पिता को जन्मदिन का तोहफा देना चाहता था पर उसने ऐसा तोहफा देने की कभी न सोची थी।