Sunday, 29 January 2017

दो पंक्तिया मन से

** या तो चुप रह के सह लो,
     या फिर अपने मन की कह लो।

** संभालना बड़ा मुश्किल,
     एक जिद्दी दिमाग और दूसरा फ़ितना दिल

** तन्हाई में ही मिलता है दिल को सुकून और चैन
     पता नहीं भीड़ में क्यों घबरा जाते हैं मेरे ये नैन

** रात सुन मेरी ख्वाइश ,ठहर जा लम्हा कुछ और
 तेरे सहारे ही तो चलता है तारो से बातो का दौर

** काश जमानत मिल जाये मेरे अरमानो को किसी के आने से
     खुद ही कैद कर के रखा है जिन्हें अभी तक मैंने  जमाने से

** अगर आँखों ने अपना फर्ज निभाया होता 
    अपनी चुप्पी पे मेरा दिल पछताया न होता

** ना ना कहते हुए भी हमसे हाँ हो गयी,
     दिल की बात थी जो आँखों से बयाँ हो गयी।

** शब्द तो मेरे हैं पर सोच है तेरी,अगर तुझे समझ आये तभी जीत होगी मेरी।

** न तीर से न तलवार से
चोट लगती है ज्यादा शब्दों के वार से

** हम भी कभी आबाद थे,बेफिक्र थे,आजाद थे ।

** मुझसे ही बात पूछकर बिलकुल अंजान बन गए,
पहले तो तुम सिर्फ झूठे थे,अब तो बेईमान बन गए।

** ख्यालो को शब्दों में ढाला तो वो जग जाहिर हो गए
चुप रहकर भी हम अपना हाल बताने में माहिर हो गए

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