Friday, 30 October 2020
पेंटिंग
Saturday, 24 October 2020
विजय
"हम" और "मैं" की लड़ाई है
एक दूजे पर की चढ़ाई है
जब "हम" ही "मैं" बन जाए
तो कैसे विजय हो पाए
आंक रहे धर्म पर
नज़र नही कर्म पर
जब धर्म कर्म पर भारी हो जाए
तो कैसे विजय हो पाए
पैसो की ही सब बात है
इन्सानियत को दी मात है
जब इंसानियत को पैसे से तोला जाए
तो कैसे विजय हो पाए
कुर्ता
नया कुर्ता पहन बाबा,राजू की शादी पर उत्सुक थे।गांव के सबसे बुजुर्ग थे,बुलावा बनता था।शादी हो गयी पर बुलावा न आया। कुर्ता पेटी में रखते हुए बाबा को कुर्ते पर दाग दिखा। "लाज रख ली भगवान ने,अच्छा हुआ बुलावा नही आया,बेज्जती होती"।कुर्ते के दाग से अपने मन को मना रहे थे बाबा।
Saturday, 17 October 2020
धूप
मीलों की दूरी थी
फिर भी नज़दीकी पूरी थी
एक सांझी धूप का सहारा था
एक उसका और एक मेरा किनारा था
वो धूप उसे छू कर देने आती थी मुझे गर्माहट
रह रह कर वो गर्मी देती थी उसकी आहट
न गर्मी न सर्दी, धूप ने न कोई भेद भाव किया
कभी भी मेरे मन को न विरह का कोई घाव दिया
तुम धूप के जैसे बन जाना
तुम धूप के जैसे बन जाना
हर मौसम में मिल जाना
खुश हो बन जाना सर्दी की धूप
गुस्से में ले लेना गर्मी का रूप
बादल, बरखा सब आएंगे
अपने अंदर तुम्हें छिपाएंगे
तुम इंद्रधनुष बना कर फिर निकल आना
सब छोड़ पीछे एक बार फिर खिल जाना
तुम धूप के जैसे बन जाना
हर मौसम में मिल जाना
Thursday, 15 October 2020
चिराग
चिराग तले अंधेरा बोल क्यों मज़ाक उड़ाते हो मेरा
खुद अंधेरे में हुँ पर देख घर रौशन कर रहा हुँ तेरा
Wednesday, 14 October 2020
चुप सा शोर
कुछ बोलने ही नही देता मन मे बैठा एक चुप सा शोर
लोग यूँ ही घमंडी मान मुझे खबरें फैला रहे हैं हर ओर
Sunday, 11 October 2020
अंधेरा
रौशनी की चाह में चिराग़ जलाया तो अंधेरा बिफर गया
बोला एक रात ही तो आती है अमावस्या तू उससे भी डर गया
पर्दा
घर की हर कमी छुपा रहा था
एक पर्दा मेरा घर सजा रहा था
फर्जी साख और मान था
पर्दा मेरी झूठी शान था
जितनी भी चीख औऱ पुकार थी
सब पर्दे के पीछे बेकार थी
छिपाने का एक जरिया था
पर्दा झूठ से भरा दरिया था
एक दिन पर्दे में सुराख़ हो गया
बेदाग़ सा घर मेरा दागदार हो गया
Sunday, 4 October 2020
जलेबी
आंगन में राधा जी मसाले सूखा रही थी और उनकी बड़ी बहु का बेटा टिंकू वही खेल रहा था।तभी गुप्ता आंटी आई।"तुम्हारी छोटी बहू तो बहुत सीधी लगती है",गुप्ता आंटी ने राधा जी को बोला
राधा जी व्यंग कसते हुए बोली " हाँ जी, बिल्कुल सीधी है जलेबी की तरह "।
खिचड़ी का त्योहार आया और नई बहु के मायके वाले आये । उन्हें जलेबी परोसी गयी।
राधा जी ने टिंकू को चाची को बुलाने को कहा।
टिंकू ने मेहमानों के सामने ही पूछ डाला कौन सी चाची को ,मझली चाची या जलेबी सी सीधी चाची को।मायके वाले अब परोसी हुई जलेबी को अनदेखा कर रहे थे और राधा जी उन्हें।जलेबी की मिठास का तो पता नही पर बाते अब जलेबियों की तरह उलझ गई थी।राधा जी ने सब संभालने के लिए अब गोल- गोल जलेबी सी बातें बनानी शुरू कर दी थी।
अब बच्चा क्या जाने "जलेबी सी सीधी" क्या होवे है?😀
चंद्रमा
ठंडी ,शीतल ,साफ वो पूर्णिमा की थी रात
जब हमने शुरू कर दी थी चंद्रमा से बात
बड़े आराम से सुनता था वो मेरी बातें रह कर इतना दूर
न कभी थकता, न कभी चिढ़ता , न कभी दिखाता गुरूर
हर रोज वो कुछ दूर होता जा रहा था,
आसमान में न जाने कहाँ खोता जा रहा था
उसे जाता देख , खो रही थी आस,
मन बैचैनी से भर,हो गया था उदास
एक दिन ऐसा आया वो दिखा न किसी भी
ओर
आसमान में भी छाया था अंधेरा घन घोर
ओ चंचल चंद्रमा तुमसे मिलने का ऐसा चढ़ा था सरूर
जब अमावस पे ना आये तो हमने मान लिया अपना ही कसूर
फिर जब तुम धीरे धीरे पास आने लगे,
उदास मन को फिर से हर्षाने लगे।
आंखों में मेरे चमक आने लगी थी
मेरी बातें तुम्हे फिर से भाने लगी थी
तुम ने बदला अपना व्यवहार, पहले पास आना फिर कराना इंतज़ार
मानो सिखा रहे हो जैसे दुख-सुख ,मिलन-विरह का सार
Saturday, 3 October 2020
बिटिया
अनु अपनी गुड़िया को "बिटिया" कहती थी।अम्मा ने देखा आज वो गुड़िया को बहुत दुलार रही थी
" बिटिया काहे इतना प्यार आ रहा है इस पर"
"मुझे और इसे बिटिया न बुलाना आज से"
"काहे"
"टीवी पर आ रहा था दरिंदो ने ले फिर एक बिटिया की जान"
अम्मा निशब्द थी काश नाम बदलने से नसीब बदल जाते ।
Friday, 2 October 2020
झूठ
बेहाली में भी अपना हाल खुशहाल बता गयी
फिर से झूठ का वो एक जाल बिछा गयी
भूख थी, पर रोटियों की गिनती उसका पेट भर गई
गले तक भरा है खाना,ये झूठ बोल वो तर गई
माथे पे लगे घाव को वो छोटी सी चोट बोल गयी
झूठ का ले सहारा वो इसे सीढ़ियों का खोट बोल गई
नारी है देवी का रूप, पर ये देवी क्यों दुःखी है
बार बार बोल झूठ ,ये क्यों होना चाहती सुखी है
बेटी
कैसे जाए इस संसार में
कई बातें लाये अपने विचार में
अब रावण बैठा हर घर मे
जीना पड़ेगा अब तो डर में
सब पापी और भक्षक है
कृष्णा,राम जैसे न रक्षक है
नारी के मान का अब कोई मोल नही
मूक दर्शको के मुँह में कोई बोल नही
हर दिन नारी चिता पर है लेटी
सोच ये सब घबराए अजन्मी "बेटी"