ठंडी ,शीतल ,साफ वो पूर्णिमा की थी रात
जब हमने शुरू कर दी थी चंद्रमा से बात
बड़े आराम से सुनता था वो मेरी बातें रह कर इतना दूर
न कभी थकता, न कभी चिढ़ता , न कभी दिखाता गुरूर
हर रोज वो कुछ दूर होता जा रहा था,
आसमान में न जाने कहाँ खोता जा रहा था
उसे जाता देख , खो रही थी आस,
मन बैचैनी से भर,हो गया था उदास
एक दिन ऐसा आया वो दिखा न किसी भी
ओर
आसमान में भी छाया था अंधेरा घन घोर
ओ चंचल चंद्रमा तुमसे मिलने का ऐसा चढ़ा था सरूर
जब अमावस पे ना आये तो हमने मान लिया अपना ही कसूर
फिर जब तुम धीरे धीरे पास आने लगे,
उदास मन को फिर से हर्षाने लगे।
आंखों में मेरे चमक आने लगी थी
मेरी बातें तुम्हे फिर से भाने लगी थी
तुम ने बदला अपना व्यवहार, पहले पास आना फिर कराना इंतज़ार
मानो सिखा रहे हो जैसे दुख-सुख ,मिलन-विरह का सार
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