मीलों की दूरी थी
फिर भी नज़दीकी पूरी थी
एक सांझी धूप का सहारा था
एक उसका और एक मेरा किनारा था
वो धूप उसे छू कर देने आती थी मुझे गर्माहट
रह रह कर वो गर्मी देती थी उसकी आहट
न गर्मी न सर्दी, धूप ने न कोई भेद भाव किया
कभी भी मेरे मन को न विरह का कोई घाव दिया
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