जब भी देखु भीतर अपने
इक अजनबी पाऊँ
कौन हुँ मैं असल में
कभी समझ न पाऊँ
कभी झिझकु भीड़ में
कभी तड़पु एकाकी पीड़ में
कभी बोल जुबाँ पर आ न पाएं
कभी बिन सोचे सब कह जाएं
कभी गुमसुम अवाक सी हुँ मैं
कभी बागी बेबाक सी हुँ मैं
अंदर मेरे ये बैठा है कौन
निष्ठुर अजनबी अब भी है मौन
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