30 साल पहले शीशम की लकड़ी से बना दरवाज़ा आज भी कायम था।तीनो बेटे घर का बँटवारा कर दरवाज़ा अपने हिस्से लेने के लिए लड़ रहे थे।मज़बूत दरवाज़ा आज कमजोर बूढ़ी माँ से ज़्यादा अहम था जिसे अपने हिस्से लेने कोई तैयार न था।शायद यह भी तय न था- वो दरवाजे के इस पार रहेगी या उस पार।
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